क्रोध । Krodh

-poetry-

कांप रहा होता तन
विचलित हो जाता है मन

खुद पर खुद का काबू खो जाता है
अंदर का इंसान मानो सो जाता है

जेहन और जबान पे रहते है शोर
खुद को सही साबित करने की होती है होर

खुद को इतना बड़ा बना लेते है कि दूसरों की बात सह न सके
चिल्लाते और हाथ उठते है कि कोई कुछ कह न सके

“वो तुमसे डरता नही
तुम उस से डर सकते नही
पीछे हट गए तो लोग क्या कहेंगे
अब तो फैसला लड़ कर ही करेंगे”

कुछ ऐसे ही ख्याल आते है
पल भर में रिश्ते तोर जाते है

घिर्ण आती है खुद पर जब गलती का एहसास होता है
हु सबसे बुरा इंसान ऐसा महसूस होता है

क्या करूँ अब सब समझ से बाहर लगता है
अंदर का इंसान मानो झट पट से जगता है

उदासी और पछतावे के अलावा कुछ हाथ नही आता है
खुद को बदलने की सिवा कोई रास्ता नही रह जाता है

पर जब क्रोध का सैलाब आता है
वह खुद को दोहराता
और सब कुछ बिखर जाता है

Author’s note: 

Its about short tempered situation and the repentance afterwards keep us in a  loop unless we break through the habit of not being aware of our impulses and reactance.

हारा हुआ । Hara hua

– poetry-

खुद को हरा समझते समझते , जितना भूल गए 

अब हाल यू है कि खुद को जीता समझने में भी हार जाते है ।

चारो तरफ उजाला था । Charo Taraf Ujaala Tha…

when words reflect life, its a poetry…
Here is the poem we all can relate to, we all get stuck somewhere at some point of life … 🙂
Lets conquer it together…

जब घनघोर अँधेरा छाया
खुद को खुद में ही अकेला पाया,
घबराया चिल्लाया शोर मचाया
पर अफ़सोस कुछ हाथ न आया।

होक उदास इस अँधेरे में
मौन, खुधको इसमें ढलने लगा,
“ऐसा ही होता है दुनिया में” कह के
खुद को ठगा।

एक दिन यूँ ही एकांत बैठा,
दूर छोटी सी रौशनी नजर आयी,
पर तब तक इतना ढल चूका था इस अँधेरे में
की ये आंखे उस पर भरोसा न कर पायी।

मुँह फेर लिया यह सोच के
की है ये बस एक धोखा,
बढ़ चला अँधेरे में दूर,
न किसी ने रोका।

अब तोह यह स्याह सी दीवारे
सच्ची लगने लगी,
इनकी तन्हाई और उदाशि भी
अच्छी लगने लगी।

चल रहा था इस तेज़ी में की
जैसे अब रुकना ही न था,
लेकिन मुक़द्दर में था कुछ और,
ज़िंदगी को ये मंजूर कहा था।

जा टकराया इन दीवारों में
फिर इनके होने का एहसास हुआ,
बंद हु एक पिंजरे में
जान के निरास हुआ।

काफी तरीके सोचे इस पिंजरे
को तोरने के लिए,
नाकाम, उदास जब पिंजरे को करीब से देखा,
तो एक सच सामने आया जो काफी था मुझे
झकझोरने के लिए।

पिंजरा तो था ही नहीं
जिसे मई तोर रहा था,
खुद को बेवजह ही
निचोड़ रहा था।

फिर मुझे उस छोटी सी रौशनी
का ख्याल आया,
आस पास देखा तो
उसे सामने ही पाया।

वो तो हमेसा यही थी
बस मई कही खो गया था,
मनो जाग रहा अब उस नींद से
जिसमे वर्षो से सो गया था।

यह रौशनी तोह उस पट्टी के छेड़ से आ रही थी
जिसे मैंने जाने अनजाने में डाला था ,
जैसे ही उतार फेका
तो चारो तरफ उजाला था
चारो तरफ उजाला था।

Written by: Harsh Vardhan (admin of the blog)

Author’s note:

This poem is based on situations where we get stuck in our life just because of our wrong perspective and belief.
When we realize things are falling apart and are beyond our control, we panic, we try heedlessly over and over to take over the control and guess what? We fail… we fail badly because we were ignorant, we refused to see the reality but when we become aware our own flaws and perspective we get to know darkness was within not everywhere else.

It’s like dawn to a world full of possibilities…
🙂

GUY PLEASE LIKE AND FOLLOW IF YOU REALLY LIKE THIS WORK, YOUR FEEDBACK WILL MOTIVATE ME TO WRITE MORE
🙂

    *PRESENTED IN HINDI*