तुम बिल्कुल हम जैसे निकले |

-poetry-

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Here’s a poem by a Pakistani poetess, Fahmida Riaz, who tried to warn India beforehand in her profound analysis of seething tensions in India, which are no different from Pakistan’s:
Here’s the text of the poem:

तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
अब तक कहां छुपे थे भाई?
वह मूरखता, वह घामड़पन
जिसमें हमने सदी गंवाई
आखिर पहुंची द्वार तुम्हारे
अरे बधाई, बहुत बधाई
भूत धरम का नाच रहा है
कायम हिन्दू राज करोगे?
सारे उल्टे काज करोगे?
अपना चमन नाराज करोगे?
तुम भी बैठे करोगे सोचा,
पूरी है वैसी तैयारी,
कौन है हिन्दू कौन नहीं है
तुम भी करोगे फतवे जारी
वहां भी मुश्किल होगा जीना
दांतो आ जाएगा पसीना
जैसे-तैसे कटा करेगी
वहां भी सबकी सांस घुटेगी
माथे पर सिंदूर की रेखा
कुछ भी नहीं पड़ोस से सीखा!
क्या हमने दुर्दशा बनायी
कुछ भी तुमको नज़र न आयी?
भाड़ में जाये शिक्षा-विक्षा,
अब जाहिलपन के गुन गाना,
आगे गड्ढा है यह मत देखो
वापस लाओ गया जमाना
हम जिन पर रोया करते थे
तुम ने भी वह बात अब की है
बहुत मलाल है हमको, लेकिन
हा हा हा हा हो हो ही ही
कल दुख से सोचा करती थी
सोच के बहुत हँसी आज आयी
तुम बिल्कुल हम जैसे निकले
हम दो कौम नहीं थे भाई
मश्क करो तुम, आ जाएगा
उल्टे पांवों चलते जाना,
दूजा ध्यान न मन में आए
बस पीछे ही नज़र जमाना
एक जाप-सा करते जाओ,
बारम्बार यह ही दोहराओ
कितना वीर महान था भारत!
कैसा आलीशान था भारत!
फिर तुम लोग पहुंच जाओगे
बस परलोक पहुंच जाओगे!
हम तो हैं पहले से वहां पर,
तुम भी समय निकालते रहना,
अब जिस नरक में जाओ, वहां से
चिट्ठी-विट्ठी डालते रहना

क्रोध । Krodh

-poetry-

कांप रहा होता तन
विचलित हो जाता है मन

खुद पर खुद का काबू खो जाता है
अंदर का इंसान मानो सो जाता है

जेहन और जबान पे रहते है शोर
खुद को सही साबित करने की होती है होर

खुद को इतना बड़ा बना लेते है कि दूसरों की बात सह न सके
चिल्लाते और हाथ उठते है कि कोई कुछ कह न सके

घिर्ण आती है खुद पर जब गलती का एहसास होता है
हु सबसे बुरा इंसान ऐसा महसूस होता है

क्या करूँ अब सब समझ से बाहर लगता है
अंदर का इंसान मानो झट पट से जगता है

उदासी और पछतावे के अलावा कुछ हाथ नही आता है
खुद को बदलने की सिवा कोई रास्ता नही रह जाता है

पर जब फिर क्रोध का सैलाब आता है
यह सब फिर से दोहराता है
और सब कुछ बिखर जाता है।

Author’s note:

Its about short tempered situation and the repentance afterwards keep us in a loop unless we break through the habit of not being aware of our impulses and reactance.