क्रोध । Krodh

-poetry-

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कांप रहा होता तन
विचलित हो जाता है मन

खुद पर खुद का काबू खो जाता है
अंदर का इंसान मानो सो जाता है

जेहन और जबान पे रहते है शोर
खुद को सही साबित करने की होती है होर

खुद को इतना बड़ा बना लेते है कि दूसरों की बात सह न सके
चिल्लाते और हाथ उठते है कि कोई कुछ कह न सके

“वो तुमसे डरता नही
तुम उस से डर सकते नही
पीछे हट गए तो लोग क्या कहेंगे
अब तो फैसला लड़ कर ही करेंगे”

कुछ ऐसे ही ख्याल आते है
पल भर में रिश्ते तोर जाते है

घिर्ण आती है खुद पर जब गलती का एहसास होता है
हु सबसे बुरा इंसान ऐसा महसूस होता है

क्या करूँ अब सब समझ से बाहर लगता है
अंदर का इंसान मानो झट पट से जगता है

उदासी और पछतावे के अलावा कुछ हाथ नही आता है
खुद को बदलने की सिवा कोई रास्ता नही रह जाता है

पर जब क्रोध का सैलाब आता है
वह खुद को दोहराता
और सब कुछ बिखर जाता है

Author’s note: 

Its about short tempered situation and the repentance afterwards keep us in a  loop unless we break through the habit of not being aware of our impulses and reactance.

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